रविवार, 15 फ़रवरी 2009

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।
निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।कवि दुष्यंत की ये कविता अज की जरुरत लग रही है

6 टिप्‍पणियां:

रचना गौड़ ’भारती’ ने कहा…

सुंदर
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
www.zindagilive08.blogspot.com
आर्ट के लि‌ए देखें
www.chitrasansar.blogspot.com

ज्योत्स्ना पाण्डेय ने कहा…

ब्लॉग की दुनिया में आपका हार्दिक स्वागत है .आपके अनवरत लेखन के लिए मेरी शुभ कामनाएं ...

अभिषेक मिश्र ने कहा…

Acchi shuruaat, Swagat.

sandhyagupta ने कहा…

Blog jagat me aapka swagat hai.

Prakash Badal ने कहा…

दुश्यंत कुमार जी की श्रेष्ठ ग़ज़लों में से एक ये ग़ज़ल भी है, पढ़वाने के लिए शुक्रिया।आपका ब्लॉग जगत में स्वागत है।

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर ने कहा…

narayan narayan