शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

वन्देमातरम दोस्तों,
लम्बी और लगभग भुला देनेवाली खामोशी के बाद आज से आप सबके बीच आपकी अपनी बातों का नजरिया लेकर फिर हाजिर हूँ । मैं आज ज्यादा कुछ नही कहना चाहता हूँ सिवाय वन्देमातरम के देश के साथ ही समाज भी इस वन्देमातरम की जरुरत को समझ रहा है आपको मुझे और हर उस व्यक्ति को जो सामाजिक वातावरण में जी रहा है उसे इसकी जरुरत महसूस होती होगी । मैं नहीं जनता कि जंतर- मंतर, नई दिल्ली पर बैठे अन्ना जो कह रहे हैं वह सही है या गलत लेकिन इतना मुझे मालूम है कि उनकी भावनायें पवित्र है और विश्वास अडिग । मैं अपनी लेखनी और जज़्बात दोनों के साथ उनका समर्थन कर रहा हूँ जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन कर रहे हैं क्या आप भी उनके साथ हैं।
इस देश में दो-दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं
एक जो जमीन पर रेंग रहा है और
एक वो जिसका पैर जमीन पर पड़ता ही नहीं है
आपका
आनंद जाट

रविवार, 15 फ़रवरी 2009

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।
निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।कवि दुष्यंत की ये कविता अज की जरुरत लग रही है

शनिवार, 15 नवंबर 2008


वंदे मातरम दोस्तों,

सवाल खड़े करने लोग परेशानी नहीं है सवालों का न होना आज कि त्रासदी हैजिन्दा लोगों का चुप रहना एक परेशानी है.

सोमवार, 18 अगस्त 2008

बधाई अभिनव बधाई भारत

वन्देमातरम दोस्तों,

आज भारत ने क्रिकेट में फ़िर से अच्छा खेल दिखाया । यकीं जानिए मुझे बिल्कुल भी खुशी नही हुई । मैं एक पल के लिए भी रोमांचित नही हुआ क्यों, क्योंकि इस समय मेरा धयान क्रिकेट पर है ही नही मैं अभिभूत हूँ अभिनव से जिसने बीजिंग में भारत के गौरव की स्वर्णिम गाथा लिखी । में सच में खुश हूँ अखिल की सादगी से, अखिल भले ही हार गए हों लेकिन उनके व्यव्हार की शान्ति मुझे आकर्षित करती है । दोस्तों ये वो विजेता है जो जो हर जीत और हार में एक जैसे रहते है । दस फाईनल हारने के बाद एक में जीत कर टी-शर्ट खोलकर लहराते नही है । दोस्तों, मुझे याद है मुंबई का वो मंज़र जब २०-२० के विश्व विजेता कप जीतकर आए थे तो कभी न रुकने वाला भारत का ये शहर चार घंटे के लिए ठहर गया था, दुःख की बात तो ये है किजिस मीडिया ने क्रिकेट पर हमेशा कागज़ और स्याही ख़राब की है काश दुसरे खेलों पर भी ध्यान दिया होता ? मुझे उम्मीद है की अभिनव की जीत के बाद तस्वीर बदलेगी । बधाई अभिनव ,बधाई भारत ।

सोमवार, 28 जुलाई 2008

धमाके के बाद धमाका

वन्देमातरम दोस्तों,
आतंक के बाद आतंक फ़िर एक और आतंक ।आतंकी एक के बाद एक सफलता दोहरा रहे है और हमारी सरकारें है की नींद से जाग ही नही पा रही है ।पहले जयपुर फ़िर बंगलुरु और अगले ही दिन अहमदाबाद। ये तीन धमाके इन् तीनों शहरों में नही हुए है । ये हमले हुए है हमारे देश हमारे भारत के ह्रदय पर , हमारी अस्मिता पर हमला हुआ है हमारे देश की जनता के दिल पर दिमाग परलेकिन अफ़सोस और दुःख की बात तो ये है की हमारे नेता हमारे तथाकतिथ कर्णधारों को अब भी ये हमला जगाने में नाकाम है । जबकि सच पूछो तो आतंकियों ने ये तमाचा करारा तमाचा उन लोगों को ही मारा है जिन्हें देश और जनता से ज्यादा चिंता सत्ता की है । आख़िर कितने लोगों की कुर्बानियों की जरुरत है हमारे इन भ्रस्त नेताओं को और कितने लगों की बलि चढेगी ? मासूम निर्दोषों की हत्या करने वाले उन आतंकी राक्षसों से भी ज्यादा गुनेहगार है हमारे अपने नेता और मंत्री। इन घडियाली आंसू बहानेवालों से पूछो कि जो लोग इन बम धमाकों में मारे गए है उनकी गलती क्या है ? कितने माताओं कि कोख उजड़ी है कितनी बहने विधवा हुई होंगी कटने बच्चे अपने पापा का पूरी जिन्दगी इंतजार करते रहेंगे । हैरत की बात तो ये है की धमाकों के बाद भी हमारे इन टुच्चे नेताओं ने राजनीति नही छोड़ी । जनता भलें ही एकजुटता के साथ मिलकर आतंकवाद से लड़ने का संदेश दे रही है लेकिन जिम्मेदार लोगों पर इन धमाकों की आवाज़ का भी कोई असर नही हुआ है । खुफिया एजेंसियां राजनितिक प्रतिशोध का जरिए बन गई है ऐसे में किससे उम्मीद करें ? जनता को अब स्वयं जागना होगा तभी शायद कुछ सम्भव है । आख़िर में मैं अहमदाबाद और बंगलुरु की जनता के जज्बे की तारीफ करना चाहता हूँ -
मुश्किलों में भाग जाना आसान होता है
हर पहलु जिन्दगी का इम्तिहान होता है
डरने वालों को कुछ मिलता नही जिन्दगी में
और लड़ने वालों के क़दमों में जहाँ होता है
आपका
आनंद 'अधीर'
वन्देमातरम ,

मैं कल रात नहीं रोया था


दुख सब जीवन के विस्मृत कर,
तेरे वक्षस्थल पर सिर धर,
तेरी गोदी में चिड़िया के बच्चे-सा छिपकर सोया था!
मैं कल रात नहीं रोया था!

प्यार-भरे उपवन में घूमा,
फल खाए, फूलों को चूमा,
कल दुर्दिन का भार न अपने पंखो पर मैं ने ढोया था!
मैं कल रात नहीं रोया था!

आँसू के दाने बरसाकर
किन आँखो ने तेरे उर पर
ऐसे सपनों के मधुवन का मधुमय बीज, बता, बोया था!
मैं कल रात नहीं रोया था!
कविवर हरीवंश राय बच्चन की कविता आप को समर्पित कर रहा हूँ क्योंकि हमारी संस्कृति मैं बड़ों का स्थान सबसे ऊपर है ।
इस ब्लॉग के मध्यम से देश की एकता , अखंडता और जनता से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार नियमित रूप से देता रहूँगा । साथ ही नए - नए तथ्यों से आपको रूबरू करवाते रहेंगे कहीं कहीं आपके विचारों को आप तक पहुँचा पाने में आपकी बात करने में सफलता पाना मेरा उद्देश्य रहेगा । सुधिजनों से सभी विषयों पर प्रतिक्रिया का इन्तेजार रहेगा ।
आपका
आनंद अधीर '