शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

वन्देमातरम दोस्तों,
लम्बी और लगभग भुला देनेवाली खामोशी के बाद आज से आप सबके बीच आपकी अपनी बातों का नजरिया लेकर फिर हाजिर हूँ । मैं आज ज्यादा कुछ नही कहना चाहता हूँ सिवाय वन्देमातरम के देश के साथ ही समाज भी इस वन्देमातरम की जरुरत को समझ रहा है आपको मुझे और हर उस व्यक्ति को जो सामाजिक वातावरण में जी रहा है उसे इसकी जरुरत महसूस होती होगी । मैं नहीं जनता कि जंतर- मंतर, नई दिल्ली पर बैठे अन्ना जो कह रहे हैं वह सही है या गलत लेकिन इतना मुझे मालूम है कि उनकी भावनायें पवित्र है और विश्वास अडिग । मैं अपनी लेखनी और जज़्बात दोनों के साथ उनका समर्थन कर रहा हूँ जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन कर रहे हैं क्या आप भी उनके साथ हैं।
इस देश में दो-दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं
एक जो जमीन पर रेंग रहा है और
एक वो जिसका पैर जमीन पर पड़ता ही नहीं है
आपका
आनंद जाट

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