इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।
निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।कवि दुष्यंत की ये कविता अज की जरुरत लग रही है
6 टिप्पणियां:
सुंदर
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहिए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
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ब्लॉग की दुनिया में आपका हार्दिक स्वागत है .आपके अनवरत लेखन के लिए मेरी शुभ कामनाएं ...
Acchi shuruaat, Swagat.
Blog jagat me aapka swagat hai.
दुश्यंत कुमार जी की श्रेष्ठ ग़ज़लों में से एक ये ग़ज़ल भी है, पढ़वाने के लिए शुक्रिया।आपका ब्लॉग जगत में स्वागत है।
narayan narayan
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